बीबीसी हिंदी की सबसे बड़ी सम्पती है उसका श्रोताओं के साथ जुडाव। आज भी इंदिरा गाँधी की हत्या और 1971 के भारत-पाक युद्ध का जिक्र आते ही उस समय की पीढ़ी के लोगों के दिमाग में पहला खयाल बीबीसी का ही आता है। यह जुड़ाव इतना गहरा है कि जब इस साल बीबीसी हिंदी के प्रसारण बंद करने की घोषणा हुई तो बीबीसी के कुछ श्रोता दिल्ली स्थित ब्रिटिश उच्चायोग तक आ पहुंचे तो कुछ ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरून के पूतले फूंकने तक की तैय्यारी कर ली।
भारत के ग्रामीण अंचल से कितने ही लोग बीबीसी हिंदी सुनकर आईएस या पत्रकार बन गए। बीबीसी हिंदी का असर ‘बुद्धू बक्से’ पर भी पड़ा। जब 1998 में एनडीटीवी अपना 24 घंटे का चैनल ( स्टार न्यूज़ के लिए ) शुरू कर रहा था तो खबर देने के अंदाज़ और खबर के वज़न को तय करने का पैमाना बना बीबीसी हिंदी का प्रसारण। एनडीटीवी की टीम को बीबीसी हिंदी की स्टाइलशीट अपनाने, उसी तरह से बोलने और खबर को तौलने के लिए कहा गया। बीबीसी हिंदी ने अपने यौवन में हर व्यक्ति और संस्थान को प्रभावित किया।
यह लेख कहानी है उस समाचार सेवा की जो पिछले सात दशक से पीढ़ी दर पीढ़ी हिंदी वाले हाशिए के लिए दुनिया की एक मात्र खिडकी रही। यह कहानी है उन लोगों की जिनमे सिर्फ खबर का रिश्ता था। यह कहानी है आज मरणासन्न पड़ी बीबीसी हिंदी की ! इस उम्मीद के साथ कि यह लेख बीबीसी हिंदी को श्रद्धांजलि न बन जाये। अंग्रेजों ने उपनिवेश काल में लगभग अपने हर उपनिवेश के लिए रेडियो प्रसारण शुरू किये। उद्देश्य था गुलाम देश के लोगों के दिलों में ब्रिटिश सरकार की नीतियों के लिए माहौल बनाना और अंग्रेजी संस्कृति को चस्पा करना। अंग्रेजों ने यह काम बीबीसी के माध्यम से किया। और देखते ही देखते विश्व की तमाम प्रमुख भाषायों में प्रसारण शुरू कर दिए। यह प्रक्रिया अस्सी के दशक तक चरम पर रही और सोवियत रूस के पतन के साथ ही इस नीति का भी पतन शुरू हो गया। कहने का आशय यह कि बीबीसी हिंदी का उद्देश्य भी जनसेवा नही बल्कि भारतीय जनमानस में ब्रिटिश संस्कृति का इंजेक्शन ठोकना था।
लेकिन चीज़ें इतनी सपाट नहीं होती। बीबीसी हिंदी में ऐसे लोग आये जिनके दिलों में भारत धडकता था। बलराज साहनी, ओंकारनाथ श्रीवास्तव, हिमांशु कुमार, कैलाश बुधवार, परवेज़ आलम, अचला शर्मा जैसे प्रसारक पीढ़ी दर पीढ़ी बीबीसी हिंदी की परम्परा इस तरह एक दूसरे को देते रहे जैसे दादी अपने कीमती गहने पूतोहु को देती है। इस दौरान मार्क टली और जोर्ज ओरवेल जैसे प्रसारक भी आये जो मूलतः आये तो बीबीसी इंग्लिश के लिए थे लेकिन उन्होंने पहचान बनाई हिंदी सीखकर बीबीसी हिंदी से। जिसे ब्रिटिश एजेंडे को प्रचारित करने के लिए शुरू किया गया था वह ब्रिटिश औज़ार धीरे धीरे भारतीय होता चला गया। बीबीसी हिंदी को विदेशी कहने पर बीबीसी हिंदी के ही एक संपादक कहते है, ‘माना कि बीबीसी विदेशी है लेकिन यहाँ काम करने वाले लोग तो भारतीय हैं और बीबीसी ने बीबीसी हिंदी को कभी ये नही कहा कि आप को फलां खबर प्रसारित नही करनी है या दबानी है।‘
आप बीबीसी हिंदी के मकसद और ब्रिटिश मूल पर चाहे कितना भी संदेह क्यूँ ना करें लेकिन श्रोताओं ने इसको दिल से चाहा और टीवी, इन्टरनेट आने के बाद भी दिल से लगाए रखा। हो सकता है कि नब्बे के दशक से पहले विकल्प के अभाव में लोग बीबीसी सुनते हों लेकिन आज भी बीबीसी हिंदी रेडियो के श्रोताओं की संख्या डेढ़ करोड से ज्यादा है। वहीँ बीबीसी हिंदी.कॉम पर हर महीने एक करोड अस्सी लाख पाठक आते हैं और इन पाठकों में से बहुत बड़ा हिस्सा अप्रवासी भारतियों का होता है। पिछले साल सितम्बर में बीबीसी हिंदी ने अपनी मोबाईल साईट भी शुरू कर दी- हिंदी की पहली पाठ्य और ऑडियो मोबाईल साईट।
बीबीसी को पाती लिखने की परम्परा का आलम तो देखिये लगातार चिट्ठी लिखने वाले श्रोता के नाम लगभग सभी श्रोताओं को याद हो जाते हैं। आप गोलपहाड़ी जमशेदपुर बोले नही की बीबीसी सुनने वाला बता देगा कि वहाँ से जंग बहादुर जी कि चिट्ठी आई है। कवि आत्मा जी, एहसान आवारा और सुरेश बरनवाल जैसे लगातार चिट्ठी लिखने वाले श्रोता बीबीसी हिंदी के श्रोताओं में रिपोर्टरों जितने ही लोकप्रिय हैं। बीबीसी में श्रोता की राय का महत्व किसी संपादक की राय से कम नही। और यहीं से बनता है प्रसारक और श्रोता में खबर का रिश्ता।
बीबीसी हिंदी की भाषा क्लिष्ट हिंदी ना होकर हिन्दुस्तानी है यानि गंगा-जमुना तहजीब की भाषा। वह भाषा जो वास्तव में भारत कि राष्ट्रभाषा है। अंग्रेजी से अनुवाद करते समय उर्दू और देशज शब्दों तक का इस्तेमाल किया जाता है। बीबीसी हिंदी में आकाशवाणी कि तरह ‘राष्ट्रीय टेलेविज़न’ को ‘राष्ट्रीय टेलेविज़न’ ना कह कर ‘सरकारी टेलेविज़न’ कहा जाता है। साथ ही बीबीसी हिंदी लगातार बदलती रहती है। चाहें वो खबर देने का अंदाज़ हो या फीचर कार्यक्रम बीबीसी हिंदी में निरंतर प्रयोग होते रहते हैं। प्रयोगधर्मिता, माँ बोली के शब्द और बीबीसी वर्ल्ड के खबर भण्डार से दुनिया भर से आई हुई ख़बरें, यहीं है बीबीसी हिंदी की रीढ़।
विदेशों में रहने वाले भारतीय पत्रकारों के अलावा दुनिया भर में भारतीय दूतावासों में रहने वाले लोग, ऑक्सफैम और रेडक्रोस जैसी राहत संथाओं में काम करने वाले भारतीय, विदेशों में रहने वाले भारतीय मजदूर, छात्र, विदेशी विश्वविद्यालयों में पढाने वाले भारतीय प्रोफेसर और यहाँ तक की पाकिस्तानी नागरिक और श्रोताओं ने बीबीसी के लिए न्यूज़ सोर्स का काम किया है। ढूँढने पर हिन्दुस्तानी बोलने वाले कहाँ नही मिलेंगे !
इसके अतिरिक्त बीबीसी हिंदी के पत्रकार कला साहित्य और रंगमंच की दुनिया से जुड़े रहते हैं। दुनिया भर के हिंदी साहित्य के संस्थानों से संपर्क करके अच्छी खासी सामग्री जुटाई जाती है। नक्सली इलाकों से नक्सलवादी बीबीसी हिंदी पर इतना भरोसा करते हैं कि खुद अपने बयान और सीडी भेज देते हैं। माना कि इस तरह हासिल की गयी ख़बरें झूठी भी हो सकती है लेकिन बीबीसी हिंदी इस तरह से सिर्फ तथ्य जुटाती है खबर नही वो भी पड़ताल के साथ। बीबीसी हिंदी के पास आर्काइव्स का भण्डार है। जे पी आंदोलन से लेकर शिमला समझौते, अमिताभ बच्चन की शादी तक की साउंड बाइट्स !
भारत के बड़े और हिंदी भाषी राज्यों में बीबीसी हिंदी का एक-एक संवाददाता है जैसे बिहार में अकेले मणिकांत ठाकुर हैं, राजधानी दिल्ली में चार या पांच, मुंबई में एक, बीबीसी के लन्दन कार्यालय में दो या तीन, वाशिंगटन, दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत में एक-एक संवाददाता है। बीबीसी हिंदी बाकी दक्षिण एशियाई सेवाओं तमिल, उर्दू, बांग्ला और नेपाली से भी सामग्री जुटाती है।
भारत में घटी किसी घटना के लिए बीबीसी हिंदी या तो अपने संवादातायों से खबर हासिल करती है या फिर वहाँ के स्थानीय पत्रकारों से। विशेषज्ञ की राय लेने के लिए विश्वविद्यालयों के प्रोफ़ेसर, रिटायर्ड अधिकारी या पूर्व नौकरशाहों और मंत्रियों से संपर्क किया जाता है। मिसाल के तौर पर जेएनयू के कई प्रोफ़ेसर विशेषज्ञ के तौर पर बीबीसी के कार्यक्रमों में अक्सर आते रहते हैं।
बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में बीबीसी के सबसे ज्यादा श्रोता है लेकिन बीबीसी हिंदी बंगाल, नेपाल, पाकिस्तान और उर्दू बोलने वाले लोगों में भी खूब लोकप्रिय है। नेपाल के एक श्रोता लिखते हैं,’ मैं नेपाल के एक गाँव का रहने वाला हूँ इस समय मेरी उम्र 45 साल है और जब मैं चार-पांच साल का था उस वक़्त से मैं बीबीसी से जुडा हूँ। मेरे पिताजी बीबीसी के आदि थे ओर उन्ही से मुझे ये शौक हुआ। मैं रोजाना बीबीसी सेवा सुनता हूँ। मेरा परिवार बीबीसी से बहुत प्यार करता है।‘ बीबीसी भारत के पूर्व संपादक संजीव श्रीवास्तव एक बार रिपोर्टिंग के लिए किसी होटल में ठहरे हुए थे। उस होटल के बाहर एक टेलीफोन बूथ था। मोबाईल फोन के आने से पहले टेलीफोन बूथ से ही खबर दी जाती थी। टेलीफोन बूथ में काले रंग का चश्मा लगाये बैठा शख्स संजीव श्रीवास्तव की आवाज़ सुनते ही बोल पड़ा ‘आप संजीव श्रीवास्तव हैं ना?’ आखिरी दिन जब संजीव वहाँ से दिल्ली वापिस आ रहे थे तो टेलीफोन बूथ वाले से लंबी बातचीत हुई और पता चला कि वह शख्स आँखों से अंधा था ! शायद यहीं होता है खबर का रिश्ता !
उत्तर प्रदेश से राम दत्त त्रिपाठी, जयपुर से नारायण बारेठ, कोलकाता से सुबीर भौमिक, श्रीनगर से अल्ताफ हुसैन, दिल्ली से रेहान फज़ल, खेलों की खबर के लिए मलय नीरव- हर कोई अपने क्षेत्र पर गहरी पकड़ रखने वाला। बीबीसी के बिहार संवाददाता मणिकांत ठाकुर के पास बिहार से जुडी हुई रिपोर्ट देने के बाद कई फोन कॉल आते हैं। कोई कहेगा आपने यह गलत किया कोई कहेगा आपने यह छोड़ दिया। बीबीसी हिंदी और इसके श्रोताओं ने दो तरफ़ा मानक स्थापित किये। जहां एक ओर बीबीसी हिंदी ने जबरदस्त काम किया वहीँ दूसरी और श्रोताओं ने एक कदम आगे बढ़कर बीबीसी को स्नेह और सम्मान दिया। शोर्ट वेब रेडियो के कान मरोड़ते हुए लोग और श्रोता क्लब अगर इस दुनिया में कहीं बचे हैं तो सिर्फ बीबीसी हिंदी के लिए।
पिछले एक दशक में बीबीसी हिंदी ने तीन मुखिया देखें हैं- हिंदी साहित्यकार अचला शर्मा, बीबीसी से ही जुड़े रहे शिवकांत जो कुछ ही समय के लिए प्रमुख रहे और 2009 में अंग्रेजी अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स छोड़कर आये अमित बरुआ। अमित बरुआ ना केवल बीबीसी हिंदी के प्रमुख हैं बल्कि बीबीसी के भारत संपादक भी हैं। बीबीसी भारत के तहत वर्ल्ड सर्विस और बाकी दक्षिण एशियाई भाषाओँ के कामकाज भी आते हैं। संजीव श्रीवास्तव के जाने के बाद बीबीसी भारत संपादक का पद ही समाप्त कर दिया गया।
बीबीसी हिंदी शोर्ट वेब रेडियो पर कुल ढाई घंटे प्रसारण करती थी। सुबह साढ़े छः बजे और आठ बजे आधे-आधे घंटे के प्रसारण। शाम साढ़े सात बजे बीबीसी हिंदी एक घंटे का मुख्य प्रसारण देता था और दिन के आखिर में रात साढ़े दस बजे आधे घंटे का प्रसारण।
बीबीसी हिंदी के श्रोताओं की मुहिम रंग लाई और आख़िरकार बीबीसी ने फैसला किया कि एक घंटे का शाम साढ़े सात बजे वाला प्रसारण अगले साल 26 मार्च तक जारी रखा जायेगा। अगर अगले साल 26 मार्च तक बीबीसी हिंदी अपने लिए खुद धन का इंतज़ाम नही कर पाती है तो इसे बंद कर दिया जायेगा। इस साल 26 मार्च को बीबीसी हिंदी के बाकी प्रसारण बंद हो गए और बचा सिर्फ एक घंटे का साढ़े सात बजे वाला प्रसारण।
लन्दन के अखबार गार्जियन में छपी एक खबर की मानें तो जब धन की कमी के चलते बीबीसी वर्ल्ड प्रबंधन अपनी विभिन्न भाषाओँ की सेवाओं में कटौती पर विचार कर रहा था उस समय बीबीसी हिंदी के प्रमुख लोग अपना पक्ष मजबूती से नही रख पाए। बीबीसी हिंदी में काम कर चुके प्रसारक भी यही मानते हैं।
बीबीसी भारत के पूर्व संपादक संजीव श्रीवास्तव आउटलुक पत्रिका में छपे लेख में लिखते हैं कि बीबीसी हिंदी के सबसे ज़िम्मेदार पद पर ऐसा व्यक्ति है जिसने पत्रकारिता में कोई बड़ा काम नही किया और उसे अच्छे से हिंदी भी नही आती। बीबीसी हिंदी के एक संवाददाता ने बातचीत में कहा, ’बीबीसी हिंदी का भविष्य अधर में है। भाषा से लेकर ख़बरों तक के मानक बदल गए हैं।’ कुछ लोगों का मानना है कि बीबीसी हिंदी के अंत की शुरुआत उसी दिन हो गई थी जब 2008 में बीबीसी हिंदी को लन्दन से दिल्ली स्थान्तरित कर दिया गया था। अचला शर्मा और शिवकांत के समय सब कुछ ठीक था।
बहरहाल जो भी हो अगर बीबीसी हिंदी को 26 मार्च 2011 के बाद भी रेडियो पर बने रहना है तो धन का इंतज़ाम करना होगा। इसी कोशिश में बीबीसी हिंदी ने अपने प्रसारणों के फीड नेपाल के कुछ एफएम चैनल्स को देने शुरू कर दिए हैं। बीबीसी हिंदी की इस समय तीन धाराएँ हैं-बीबीसी हिंदी रेडियो, बीबीसी हिंदी ऑनलाइन और बीबीसी एफएम। बीबीसी एफएम का मकसद निजी एफएम चैनलों के लिए कार्यक्रम बनाना है। इससे अच्छी खासी कमाई हो जाती है। .
शायद आपको जानकर आश्चर्य हो कि अंग्रेजी पत्रिकाओं फेमिना और फिल्मफेर में बीबीसी का पचास फीसदी और रेडियो वन एफएम 94.3 में 17.5 फीसदी हिस्सा है। कहने का आशय ये कि बीबीसी भारत से अच्छा खासा पैसा बना रही है फिर भी बीबीसी हिंदी के लिए पैसा नही है !
श्रोताओं की कोशिशों के बदौलत डूबती हुई बीबीसी हिंदी को एक साल के लिए तिनके का सहारा तो मिल गया लेकिन जब खुद ही पैसो का इंतज़ाम करना हो तो बीबीसी का क्या मतलब और क्या काम ? खुद ब्रिटेन के लोग भी ये मानते हैं कि अब हमारा साम्राज्य नही है तो बीबीसी हिंदी चलाकर पैसे बर्बाद क्यूँ किये जाएँ ? भारत सरकार के नियम भी ऐसे है कि सबसे सस्ता माध्यम होने के बावजूद भारत में रेडियो प्रसारण सस्ता नही रहता। भारत की जमीं से सिर्फ आकाशवाणी ही ख़बरें दे सकता है। इसलिए बीबीसी को अपने ओमान और नेपाल स्थित ट्रांसमीटरों से हिंदी प्रसारण करना पड़ता है जिससे रेडियो प्रसारण बहुत महंगा हो जाता है। देर सवेर बीबीसी हिंदी का जाना और सुनहरे युग का अंत होना निश्चित है।
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