होना तो यह चाहिए कि जब आपकी टीम खेले तो आपके सबसे अच्छे खिलाड़ी मैदान पर हों. लेकिन भारतीय हॉकी टीम के लिए खेल का यह नियम लागू नही होता. अजलान शाह कप के लिए मलेशिया जाने वाली टीम में अनुभवी ड्रेग फ्लिकर संदीप सिंह और पिछले साल भारतीय हॉकी टीम के लिए सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले सरदारा सिंह को शामिल नही किया गया है. इनकी गलती सिर्फ इतनी है कि ये खिलाड़ी भारतीय हॉकी पर कब्ज़े के लिए चल रही लड़ाई में गलत समय पर गलत पक्ष के साथ हो लिए.
दरअसल भारत में हॉकी को चलाने के लिए कोई एक और स्पष्ट संस्था नही है. एक तरफ है पुरानी, गिल साहब वाली भारतीय हॉकी महासंघ (आईएचएफ) और दूसरी है 2008 में बनी हॉकी इंडिया. जहां भारत सरकार और खेल मंत्रालय आईएचएफ को मान्यता देते हैं तो वहीँ विश्व हॉकी संगठन का मानना है कि हॉकी इंडिया ही भारत की असली हॉकी संस्था है. हॉकी खिलाडी चक्की के इन्ही दो पाटों में दाने की तरह पिस रहे हैं.
भारतीय हॉकी का अभिभावक कौन है यह तय करने के लिए मामला अदालत में भी गया. और पिछले साल दिल्ली हाई कॉर्ट ने आईएचएफ के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सरकार पर आईएचएफ की बजाय हॉकी इंडिया को मान्यता देने पर दस हज़ार का जुर्माना लगा दिया. कॉर्ट के फैसले के बाद ही सरकार ने आईएचएफ को मान्यता दी. इससे पहले सरकार भी हॉकी इंडिया के साथ थी.
दिल्ली हाई कॉर्ट के फैसले के खिलाफ अर्जी दाखिल करते हुए हॉकी इंडिया मामले को सुप्रीम कॉर्ट में ले गई. सुप्रीम कॉर्ट ने यह फैसला दिया कि सभी पक्षों की सुनवाई होने और अंतिम फैसला आने तक भारतीय हॉकी की कमान हॉकी इंडिया के पास रहेगी.
बहरहाल इस असमंजस की स्थिति का आलम यह कि कुछ राज्य हॉकी संघ हॉकी इन्डिया से जुड़े हुए हैं तो कुछ आईएचएफ से. राज्य संघों ने भी अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार दोनों में से किसी एक का हाथ पकड़ रखा है. किसी टूर्नामेंट में खेलने जा रहे खिलाडियों को रेलवे सस्ता टिकट देता है. उसे भी समझ नही आ रहा किस संस्था के खिलाड़ी को सस्ता टिकट दें और किसको नही? ऐसे में हॉकी खिलाडियों को खुद अपने खर्चे पर यात्रा करनी पड़ती है.
पिछले साल नियो स्पोर्ट्स चैनल चलाने वाली कंपनी निम्बस कॉम ने आईएचएफ के साथ के साथ दस शहरों की टीमों वाली ‘वर्ल्ड सीरीज हॉकी लीग’ शुरू करने का करार किया और यहीं से शुरू हो गई खिलाडियों की दुविधा. इस हॉकी लीग में खेलने पर खिलाड़ियों को अच्छा खासा पैसा मिलेगा और खूब सारे मैच खेलने को मिलेंगे. लेकिन खिलाड़ियों के लिए इस हॉकी लीग से जुडने का मतलब होगा विश्व हॉकी संस्था से मान्यता प्राप्त हॉकी इंडिया के कोप का भाजन होना और हॉकी इंडिया के प्रतिबन्ध का सामना करना. कहने का आशय यह कि इस साल नवम्बर में शुरू हो रही वर्ल्ड सीरीज़ हॉकी लीग में खेलने वाला खिलाड़ी भारतीय हॉकी टीम के लिए नही चुना जाएगा.
सरदारा सिंह और संदीप सिंह ने इस हॉकी लीग में खेलने के लिए करार कर लिया. खिलाड़ियों की इस ‘जुर्रत’ पर हॉकी इंडिया ने तुरंत कार्रवाई की और इन बेहतरीन खिलाड़ियों पर प्रतिबन्ध लगा दिया. पिछले दिनों कर्नाटक के लिए खेल रही कुछ महिला खिलाड़ियों को यह पता भी नही चला कि वो जिस टूर्नामेंट में खेल रही हैं वह आईएचएफ का टूर्नामेंट है. आईएचएफ के टूर्नामेंट में खेलने वाले खिलाड़ी हॉकी इंडिया के लिए अछूत हैं इसलिए उनको भारत की टीम में नही चुना गया.
इस पूरे झमेले में विश्व हॉकी संघ की भूमिका पाकिस्तानी कवि इब्ने इंशां की कविता के हकीम की तरह रही है जिसके पास हॉकी इंडिया और आईएचएफ अपने इलाज़ के लिए जाती हैं. विडम्बना तो देखिये इब्ने इंशां ने यह कविता उस दौर में लिखी थी जब भारत की हॉकी चरम पर थी.
चिड़िया दाल का दाना लाई
और
चिडा लाया चावल का दाना
दोनों ने अलग-अलग हंडिया चढाई
खिचड़ी न पकाई
क्या देखते हैं कि दो ही दाने हैं
चिडे ने चावल का दाना खाया
चिड़िया ने दाल का दाना उठाया
चिडे को खाली दाल से पेचिश हो गई
चिड़िया को खाली दाल से कब्ज हो गया
दोनों हकीम के पास गए
हकीम एक बिल्ला था !
भारतीय हाकी के संदर्भ में इंशा जी की यह कविता बिलकुल सटीक व्यंग्य है।बहरहाल एक अच्छे आलेख के लिए बधाई।
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