बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

टीआरपी अधिकार बनाम नागरिक अधिकार

उदार पूंजीवादी लोकतंत्र भारत में कोई नागरिक कितना शक्तिशाली है इस बात का निर्धारण कैसे हो ? भाषा , लिंग  , जाति , शिक्षा जैसे कई नागरिक शक्ति मापक गिनाये जा सकते हैं . पर क्या आपने कभी सोचा है कि टीआरपी मीटर से आपकी दूरी भी आपकी संवैधानिक  ताकतों को कम या ज्यादा कर सकती है . चलिए आपको माजरा बता ही दिया जाय . मुंबई में शिवसेना के कार्यकर्ताओं ने  कुछ केबल  ऑपरेटर्स को   सख्त 'आदेश ' दिया है कि वे ' कलर्स' चैनल को न दिखाएँ क्यूंकि इस चैनल पर प्रसारित होने वाले कार्यकर्म ' बिग बॉस ' में दो प्रतिभागी पाकिस्तान के हैं . शिवसेना के कार्यकर्ताओं का कहना है कि या तो पाकिस्तानी प्रतिभागियों को इस कार्यक्रम  से  बाहर किया जाय नहीं तो हम चैनल नहीं चलने देंगे . नतीजतन मुंबई के कुछ इलाकों में   केबल ऑपरेटर्स ने कलर्स चैनल को ब्लैक आउट कर दिया  और बिग बॉस के प्रायोजक पहुँच गए कलर्स के घर अपना कुछ पैसा वापिस लेने के लिए . चैनल पर दबाव बनेगा तो दो बाते होंगी  या तो चैनल पाकिस्तानी प्रतिभागियों को पिछले दरवाजे से बाहर कर देगा या फिर प्रायोजकों को कुछ पैसा वापिस कर देगा- जिसकी  सम्भावना बहुत कम है . यानि मुंबई के कुछ इलाकों कि एक छोटी सी घटना कथित राष्ट्रीय चैनल को अपनी कार्यशैली बदलने पर मजबूर कर सकती है . अब कुछ गहरे सवाल - अगर ऐसी ही घटनाएँ किसी पटना , लखनऊ , जयपुर , चंडीगढ़ में होती तो क्या प्रायोजक अपना पैसा वापिस मांगते -निश्चित तौर पर नही. दूसरा सवाल क्या प्रायोजकों  का ऐसा व्यवहार लठवादी , जनता द्वारा उजाड़ दी गयी ताकतों को समानांतर सत्ता चलाने का मौका नही देता ? लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण है मेट्रो इंडिया की छींक का चीख बन जाना और पूर्वोत्तर , नक्सली इलाकों की चीख का मौन बन जाना . दर असल मुंबई में लगे टीआरपी मीटर मुंबई के लोगों को अतिरिक्त ताकत देते हैं , इस टैम ( टीआरपी मापने वाली कंपनी  ) अधिकार के आगे समान नागरिक अधिकार जैसे अधिकार बेमानी हो जाते हैं . जब अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करने वाले मंच मेट्रो अभिव्यक्ति मंच बन कर रह जाएँ तो शेष भारत के नागरिक मात्र वोट देने की मशीन भर बन के रह जायेंगे और मेट्रो में भी पोश इलाके  . प्रायोजकों का ये तर्क कि मेट्रो शहरों में प्रीमियम ग्राहक रहते हैं भी गले से नही उतरता . अगर सेलुलर ऑपरेटर्स एसोसिएसन ऑफ इंडिया के आंकड़ो पर गौर करें तो इस वित्त वर्ष कि पहली तिमाही में मेट्रो शहरो  कि 5 % जनता ने सेल फ़ोन पर 2300 करोड़ रुपये कि बात की है वहीँ दूसरी और शेष भारत ने इसी दौरान 28000 करोड़ रुपये फ़ोन में बैलेंस के रूप में डलवाएं हैं . कुल मिलाकर लब्बो लुआब ये की अगर आपके शहर में टीआरपी मीटर नही लगा है तो आपकी मुश्किलें और आन्दोलन बस आप तक सीमित है उसके साथ भारत नमक राष्ट्र नही जुड़ेगा . जाति , लिंग , भाषा जैसे कारक पहले ही समान नागरिक  अधिकार को खोखला कर चुके हैं और ये टैम अधिकार या टीआरपी अधिकार उस कमजोरी को और मजबूत कर रहा है . अगर समय रहते टैम पर लगाम नही डाली गयी तो वो होगा जो कभी नही हुआ . अब आप तय कर लीजिये की आप किस दर्जे के भारतीय हैं दोयम, तियम या चौयम  ....................