गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

थी बीबीसी

"आप मुझे उम्र के इस पड़ाव में धोखा नही दे सकते " बीबीसी हिंदी का एक श्रोता लिखता है . दूसरा श्रोता लिखता है "ये एक ऐसी आदत थी जो मैं अपने बच्चों को देकर जाना चाहता था ". दूर दूर से बीबीसी के श्रोता लगभग रोते हुए फोन कर रहे हैं "आप ऐसा नही कर सकते " मानो साहित्य वाली प्रेमिका अपने प्रेमी से  कह रही हो .  बीबीसी हिंदी 31 मार्च से अपने रेडियो प्रसारण बंद कर रही है. शाम को बीबीसी सुनते हुए सबके साथ  मिल बैठकर  खाना  या छत  पर ठन्डे आसमान को निहारते हुए बीबीसी सुनना ,  अलग ही मज़ा होता है या यूं कहें की होता था  .अपने सत्तर साल के जीवनकाल में बीबीसी हिंदी ने न  जाने कितने लोगों को  हिमालय सी गरीबी को चीरकर  आईएएस और पत्रकार बनने में मदद  की है.खासकर यूपी और बिहार के  वे युवा जिनके परिवार और गाँव का दूर दूर तक पढाई से कोई लेना देना  नही था . बीबीसी हिंदी के आज भी तीन करोड़ श्रोता है जिनमे सत्तर फीसदी  ऐसे है  जिनके घर में मिट्टी  के तेल वाली ढिबरी से रोशनी होती है .यूपी-बिहार   के बारे में कहा जाता है कि वहां के आम मजदूर और किसान की राजनीतिक समझ दिल्ली के मंत्रालयों में बैठे बाबुओं से ज्यादा होती है .  उन मजदूरों और किसानों के  लिए बीबीसी ही दुनिया को जानने समझने का एक मात्र जरिया थी .यूपी-बिहार ही क्यूं बल्कि पूरे उत्तर भारत के वे नागरिक जो 'इंडिया' के मीडिया के लिए ग्राहक नही बन पाए और जिनके पास कोई ओर विकल्प नही था उनके लिए बीबीसी  एक शिक्षक के समान थी .बीबीसी हिंदी के कई श्रोता  ऐसे  भी हैं जो पिछले 40 -50  साल से बीबीसी सुन रहे हैं .कोई भी बीबीसी सुनने वाला बता देगा कि कवि आत्मा जी या एहसान आवारा कौन है ? ये बीबीसी के प्रसारक नही बल्कि आम श्रोता  थे. बीबीसी को चिट्ठी लिखना और कार्यक्रम में चिट्ठी का शामिल हो जाना उस श्रोता के लिए गौरव की बात हो जाती थी और लगातार चिट्ठी लिखने वाले श्रोताओं के नाम भी याद हो जाते थे .
थी बीबीसी

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